बरसों हो गए तुझे देखे, तेरी गली फिर आ जाऊँ क्या।
तुझे जब भूल नहीं पाया, तो खुद को ही भुलाऊँ क्या।
जो लफ्ज़ कह न सका, ख़त में लिखकर भिजवाऊँ क्या।
तेरी जुदाई ने तोड़ दिया, अब खुद को और सताऊँ क्या।
जो अश्क बहे थे आँखों से, वो तुझको आज दिखाऊँ क्या।
तेरी चौखट की ख़ामोशी से, अपनी तन्हाई मिलाऊँ क्या।
जिस राह पर तू मिला था, उस राह से फिर हो आऊँ क्या।
तू जो न समझा मेरी ख़ामोशी, गैरों को फिर बताऊँ क्या।
अब हर साज़ उदास सा है, तेरी धुन कोई गुनगुनाऊँ क्या।
तेरी रुसवाई के डर से, अपने दिल को बहलाऊँ क्या।
जो था मेरा, बस तेरा ही, अब खुद को तुझसे बचाऊँ क्या।
अगर मोहब्बत है कोई गुनाह, तो ये इल्ज़ाम उठाऊँ क्या।
तेरी बेरुख़ी के साए में, अपने जख़्म को छुपाऊँ क्या।
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