जज़्बात नहीं हों दिल में, तो इज़हार कौन करेगा?
अगर यक़ीन हो जाए कि कल मरना ही है ,
तो फिर आज को बेवजह बेकार कौन करेगा?
हर ख्वाहिश भी बन जाए सबक़ सज़ा जैसा,
फिर चाहत के हुनर का इक़रार कौन करेगा?
जिसे वक़्त की क़द्र हो, वो हर लम्हा जी लेता है,
कल की आस में बैठकर इंतज़ार कौन करेगा?
हर लम्हा अगर दिमाग़ की अदालत में पेश हो,
तो दिल के फ़ैसलों का इख़्तियार कौन करेगा?
अगर हर एहसास पे शक की नज़र रखी जाए,
उस रिश्ते को फिर दिल से स्वीकार कौन करेगा?
हर शख़्स अब वफ़ा का मतलब ही भूल बैठा है,
तो फिर टूटे हुए दिलों पे ऐतबार कौन करेगा?
अगर इश्क़ भी अब तिजारत की तरह हो जाए,
तो फिर जज़्बातों की सच्ची दरकार कौन करेगा?
अगर हर मोड़ पे एहसास ही ज़ख़्म बन जाए,
तो फिर इस जहां में प्यार बेशुमार कौन करेगा?
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